कालाष्टमी कालभैरव जयंती कथा महत्व पूजा विधि

कालाष्टमी  के दिन भैरव देव का जन्म हुआ था इसलिए इसे भैरव जयंती अथवा काल भैरव अष्टमी भी कहा जाता हैं | भैरव देव भगवान शिव का रूप माने जाता हैं | यह उनका एक प्रचंड रूप हैं | यह भैरव अष्टमी,भैरव जयंती, काला- भैरव अष्टमी और काला- भैरव जयंती के नाम से जाना जाता हैं | यह भैरव के भगवान के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं | भैरव रूप भगवान शिव का एक डरावना और प्रकोप व्यक्त करने वाला रूप हैं |

काल भैरव जयंती कब मनाई जाती हैं ?

यह हिंदू महीने में कार्तिक के ढलते चाँद के पखवाड़े में आठवें चंद्र दिन पर पड़ता है अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन यह पर्व मनाया जाता हैं |नवंबर दिसम्बर के माह में यह एक ही दिन आता हैं जिसे काला अष्टमी कहते हैं | कृष्ण पक्ष की सभी अष्टमी को काल भैरव को समर्पित कर कालाष्टमी कहा जाता हैं |


यह दिन पापियों को दंड देने वाला दिन माना जाता हैं इसलिए भैरव को दंडपानी भी कहा जाता हैं | मान्यतानुसार कुत्ते को भैरव बाबा का प्रतीक समझा जाता हैं क्यूंकि कुत्ता भैरव देव की सवारी हैं इसलिए इनमे स्वस्वा भी कहा जाता हैं |

kalabhairav jayanti Katha Mahatva

काल भैरव जयंती कथा महत्व :

एक बार ब्रह्मा विष्णु एवम महेश तीनो में कौन श्रेष्ठ इस बात पर लड़ाई चल रही थी |  तब ही ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को अपशब्द कह दिये जिसके कारण भगवान शिव को क्रोध आ गया और उस क्रोध से भैरव का जन्म हुआ | भैरव ने क्रोध में ब्रह्मा जी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया तब ही से ब्रह्मा के पास चार मुख हैं | इस प्रकार ब्रह्मा जी के सर को काटने के कारण भैरव जी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया | उनके पाप के कारण दंड मिला इसलिए भैरव को कई समय तक एक भिखारी की तरह रहना पड़ा |इस प्रकार वर्षो बाद वाराणसी में इनका दंड समाप्त होता हैं | इसका एक नाम दंडपानी पड़ा इस प्रकार भैरव जयंती को पाप का दंड मिलने वाला दिवस भी माना जाता हैं |

kalabhairav jayanti puja vidhi

भैरव जयंती पूजा कैसे की जाती हैं ?

  • यह पूजा रात्रि में की जाती हैं | पूरी रात शिव पार्वती एवम भैरव की पूजा की जाती हैं |
  • भैरव बाबा तांत्रिको के देवता कहे जाते हैं इसलिए यह पूजा रात्रि में होती हैं |
  • दुसरे दिन जल्दी उठकर भगवान शिव के भैरव रूप पर राख चढ़ाई जाती हैं |
  • इस दिन कुत्ते की भी पूजा की जाती हैं उसे भोग में कई चीज़े दी जाती हैं |
  • इनकी पूजा करने वालो को किसी चीज़ का भय नहीं रहता और जीवन में खुशहाली रहती हैं |
इस प्रकार यह पूजा संपन्न की जाती हैं | कश्मीर की पहाड़ी पर वैष्णव देवी का मंदिर हैं जिसके पास भैरव का मंदिर हैं | ऐसी मान्यता हैं कि जब तक भैरव नाथ के दर्शन नहीं किये जाते जब तक वैष्णव देवी के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता |

काल भैरव जयंती कब मनाई जाती हैं ?

यह हिंदू महीने में कार्तिक के ढलते चाँद के पखवाड़े में आठवें चंद्र दिन पर पड़ता है अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन यह पर्व मनाया जाता हैं |नवंबर दिसम्बर के माह में यह एक ही दिन आता हैं जिसे काला अष्टमी कहते हैं | कृष्ण पक्ष की सभी अष्टमी को काल भैरव को समर्पित कर कालाष्टमी कहा जाता हैं |
यह दिन पापियों को दंड देने वाला दिन माना जाता हैं इसलिए भैरव को दंडपानी भी कहा जाता हैं | मान्यतानुसार कुत्ते को भैरव बाबा का प्रतीक समझा जाता हैं क्यूंकि कुत्ता भैरव देव की सवारी हैं इसलिए इनमे स्वस्वा भी कहा जाता हैं |

kalabhairav jayanti Katha Mahatva

काल भैरव जयंती कथा महत्व :

एक बार ब्रह्मा विष्णु एवम महेश तीनो में कौन श्रेष्ठ इस बात पर लड़ाई चल रही थी |  तब ही ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को अपशब्द कह दिये जिसके कारण भगवान शिव को क्रोध आ गया और उस क्रोध से भैरव का जन्म हुआ | भैरव ने क्रोध में ब्रह्मा जी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया तब ही से ब्रह्मा के पास चार मुख हैं | इस प्रकार ब्रह्मा जी के सर को काटने के कारण भैरव जी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया | उनके पाप के कारण दंड मिला इसलिए भैरव को कई समय तक एक भिखारी की तरह रहना पड़ा |इस प्रकार वर्षो बाद वाराणसी में इनका दंड समाप्त होता हैं | इसका एक नाम दंडपानी पड़ा इस प्रकार भैरव जयंती को पाप का दंड मिलने वाला दिवस भी माना जाता हैं |

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भैरव जयंती पूजा कैसे की जाती हैं ?

  • यह पूजा रात्रि में की जाती हैं | पूरी रात शिव पार्वती एवम भैरव की पूजा की जाती हैं |
  • भैरव बाबा तांत्रिको के देवता कहे जाते हैं इसलिए यह पूजा रात्रि में होती हैं |
  • दुसरे दिन जल्दी उठकर भगवान शिव के भैरव रूप पर राख चढ़ाई जाती हैं |
  • इस दिन कुत्ते की भी पूजा की जाती हैं उसे भोग में कई चीज़े दी जाती हैं |
  • इनकी पूजा करने वालो को किसी चीज़ का भय नहीं रहता और जीवन में खुशहाली रहती हैं |
इस प्रकार यह पूजा संपन्न की जाती हैं | कश्मीर की पहाड़ी पर वैष्णव देवी का मंदिर हैं जिसके पास भैरव का मंदिर हैं | ऐसी मान्यता हैं कि जब तक भैरव नाथ के दर्शन नहीं किये जाते जब तक वैष्णव देवी के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता |